मुझमे आग भर दो.. (HAPPY INDEPENDENCE DAY)

हे ईश्वर

 

मुझमे तू आग भर दे

 

या तो मै खुद जल जाऊँ

 

या जला कर ख़ाक कर दूँ

 

अपनी इस चुप्पी को

 

जो इतना सब कुछ सुनकर भी

 

अब तक खामोश है,

 

या अपनी इन नज़रों को,

 

जो सब कुछ देख कर भी

 

कहीं और मदहोश है..

 

या अपनी इस कलम को,

 

 

जिसने अपनी धार खो दी है..

 

या अपनी इस स्याही को,

 

जो अब मंहगाई पर रो दी है?

 

करने वाले के लिए कुछ भी नहीं मुश्किल,

 

और हम जैसों के लिए जाने कितनी बाधाएं

 

कितनी ही दिक्कतें और

 

कितनी मजबूरियां

 

सब हमारे लिए ही रास्ता रोके खड़ी हैं,

 

सोचता हूँ

 

क्या गाँधी, नेहरु, सुभाष, 

 

खुदीराम या भगत सिंह

 

इन सब के पास कोई काम नहीं था

 

या इन्होने अपनी हर मज़बूरी,

 

हर बाधा, हर इच्छा का

 

हवन कर दिया था?

 

क्या इन्हें डर नहीं था मरने का?

 

या इनकी माताएं बेफिक्र थी

 

इनके फांसी पर झूल जाने पर भी?

 

कुछ नहीं,

 

बस वक़्त का फेर है,

 

तब इन माँओं के लिए पूरा देश बेटा था

 

आज के बेटे के लिए अपनी माँ ही गैर है..

 

जब उसके लिए माँ ही कुछ नहीं तो कैसी मिट्टी

 

कैसी मात्रभूमि?

 

और क्या माटी का कर्ज?

 

अब देश से ज्यादा

 

ईमान से ज्यादा

 

माँ से ज्यादा

 

पैसा जो हो गया है..

 

आखिर मंहगाई जो इतनी बढ़ गयी है..!

 

घर पहले,

 

देश के बारे में सोचने को तो

 

सौ करोड़ लोग हैं ही..

 

यही सोच रहे हो क्या?

 

–GOPAL K.DAS

Published in: on August 15, 2008 at 12:06 pm Leave a Comment

DARD

दर्द तब तक ही दर्द देता है..

जब तक हम उसे

पराया समझते हैं..

जब उसे सहते सहते..

उसके आदी हो जाते हैं

तो वही दर्द हमे

प्यारा भी लगने लगता है..

क्यूंकि..

वो दर्द बेवफा तो नहीं होता..

खुशियों की तरह..

जो जरा जरा सी बात पर

रूठ जाती है..

चली जाती है

तन्हा छोड़ कर..

बिलकुल तन्हा..

जहां अपनी परछाई भी

साथ न दे..

ऐसे अन्धकार में

धकेल कर..

कब तक?

आखिर कब तक भागूं ?

इन खुशियों के पीछे..??

जो हमे देख कर भी रहती है..

अपनी आँखें मीचे..

इन खुशियों से अच्छी तो

ये दर्द हैं..

जो बिना बुलाये आ जाती हैं..

वो भी

अपने पुरे परिवार के साथ..

निभाने को साथ

दिन हो या रात..

जो कभी बेवफाई तो नहीं करती

दिल में आबाद रहती है..

शायद जिंदगी भी यही कहती है..

कि सुख दुःख तो

जीवन का अंग है..

सबके अपने-अपने

जीने का ढंग है..

कहीं अँधेरा कहीं उजाला

यही तो

जिंदगी का रंग है..!!

Published in: on July 2, 2008 at 7:13 am Leave a Comment

MAI HU NETA

Logon ko Bhadkaata hu,

Aapas me Ladwaata hu;

Unki Dhan-Sampatti lekar,

Fir mai Mauj manaata hu..

 

Gaban kar ke Sarkaar ki,

Aankhon me Dhool Udaata hu;

Gehu, Chaawal, Daal Dabaakar,

Mahage Daam Kamaata hu..

 

Badh gayi hai Aabadi Desh ki,

Dange kar ke Marwaata hu;

Swaarth Siddh karne ko Apni,

Logon ki Balee Chadhaata hu..

 

Tikdam se Kurshi karta Haasil,

Sabki Sarkaar giraata hu;

Acting me bhi mai hu Maahir,

Ghadiyaali Aansu bahaat hu..

 

Kale Kartooton ki Kaalikh lagne par,

Noton se Daag Chhudaata hu;

Mai hu NETA tere DESH ka,

Tum sab par Raaj chalaata hu..

 

                        GOPAL K.

Published in: on June 30, 2008 at 1:03 pm Leave a Comment

BASANT

Aaya Basant Ritu Paawan,
Lekar sang madmast Saawan..

Baagon pe chha gayi Bahaar,
Saajan ka banu mai Pyaar..

Jhoola dalo Ri Sakhiyaan,
Kabse tarse thi Ankhiyaan..

Bachpan ke din aaye Yaad,
Mili Sakhee Dino ke baad..

Badhaa Paig Jhoola jhoolein,
Hum tum is Nabh ko chhu lein..

Yaad reh jaye ye Saawan,
Naachu itna karta Mann..

Odhee mai Dhaani Chunri,
Bole Koyal tu Sun Ri..

‘Pihoo-Pihoo’ Panchhi bole,  
Piya Naam sun Mann dole..!!

Published in: on at 12:35 pm Leave a Comment